डॉ. भीमराव अंबेडकर हॉस्पिटल में एमआरआई, सीटी स्कैन में लगे 20 दिन वजह क्या ?

CG News : डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल प्रदेश का सबसे बड़ा टर्सरी केयर सेंटर है। यहां न सिर्फ प्रदेश से बल्कि ओडिशा, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश से भी गंभीर, अति-गंभीर मरीज रेफर किए जाते हैं। रोजाना 2500 की ओपीडी, 1000 मरीजों की आईपीडी है। बड़ी-बड़ी मशीनों से हर जांच की सुविधा है। काबिल डॉक्टर हैं। बावजूद इन सबके मूलभूत सुविधाओं के अभाव में मरीज और उनके परिजन संघर्ष करते हैं। ये स्ट्रेचर धकेलते हैं।
ब्लड-यूरिन के सैंपल पैथोलॉजी में छोड़ते हैं। फिर जांच रिपोर्ट लाकर वार्ड में जमा करते हैं और तब इलाज शुरू होता है। क्योंकि इतने बड़े अस्पताल में सेंट्रलाइज्ड सैंपल कलेक्शन सेंटर सिस्टम ही नहीं है। इतना ही नहीं एमआरआई में 30 दिन की वेटिंग है, सीटी स्कैन में 15 से 20 दिन की। सवाल यह है कि क्या ये सिस्टम नहीं बदलना चाहिए? क्योंकि यहां आने वाले मरीज और उनके परिजन आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते हैं। कम पढ़े-लिखे तबके से होते हैं। बिना किसी पहुंच (एप्रोच) के जैसे-तैसे यहां तक पहुंचते हैं।
अंबेडकर अस्पताल ही उनकी आखिर उम्मीद होती है। पर्ची बनवाई। एक सामान्य मरीज की तरह और कुछ अन्य मरीजों के साथ वार्ड-वार्ड जाकर पूरे सिस्टम को स्कैन किया। जो देखा, वह इन तस्वीरों के जरिए आपके सामने है। समस्याएं छोटी हैं, मगर ये मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करती हैं। जबकि इन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है।
अंबेडकर अस्पताल अधीक्षक डॉ. एसबीएस नेताम बोले- मैं जानकारी देता हूं, वर्जन पीआरओ से लीजिए। पीआरओ शुभ्रा सिंह ठाकुर ने कहा- सेंट्रल सैंपल कलेक्शन यूनिट प्रस्तावित है। सीजीएमएससी को स्ट्रक्चर बनाना है। मैं स्वीकार करती हूं कि एमआरआई, सीटीस्कैन में वेटिंग है क्योंकि मरीजों के अनुपात में मशीनें कम हैं। डिमांड भेजी गई है। अस्पताल में पेपरलेस सिस्टम नहीं है।
1. स्ट्रेचर धकेलते परिजन
गेट 1 में तैनात स्ट्रेचर बॉय मरीजों को स्ट्रेचर पर लिटाकर केजुअल्टी-ट्रामा तक पहुंचाते हैं। किसी वार्ड में स्ट्रेचर बॉय नहीं हैं। परिजन ही धकेलकर हैं।
क्या कभी थी व्यवस्था- प्रबंधन ने 2017 में 18 स्ट्रेचर बॉय की नियुक्ति की थी, जो केजुअल्टी-ट्रामा में रहते हैं, वार्ड में नहीं।
क्या होना चाहिए- गेट-1 के साथ, गेट-2 पर भी 24 घंटे स्ट्रेचर बॉय तैनात हों। कम से कम हर वार्ड में एक स्ट्रेचर बॉय की नियुक्ति जरूर हो। ताकि वे मरीज को जांच के लिए ला, ले जा सकें। परिजनों को भटकना न पड़े।
2. परिजन खुद छोड़ने जाते सैंपल परिजन सैंपल लेकर भटकते हुए पैथोलॉजी पहुंचते हैं
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क्या कभी थी व्यवस्था- 2017-18 में सैंपल के लिए मल्टीपर्पस स्टॉफ की नियुक्तियां की गई थीं। मगर, यहां से स्टॉफ हटा दिए गए।
क्या होना चाहिए- सेंट्रलाइज्ड कलेक्शन सेंटर हो। इसमें परिजनों का कोई इंवोल्वमेंट न हो। मौजूदा सिस्टम में भी ये व्यवस्था बन सकती है।
3. एमआरआई, सीटी स्कैन में वेटिंग अस्पताल में 1 सीटी स्कैन, 1 एमआरआई मशीन है।
क्या थी व्यवस्था- पहले मरीज कम थे तो जांच का लोड कम था। अब ये आउटडेटेड हो गई हैं।
क्या होना चाहिए- सीटी स्कैन और एमआरआई जरूरी जांच हैं। ये सेवाएं 24 घंटे हो। 4 साल पहले 1 एमआरआई, 1 सीटी स्कैन, 4 सोनोग्राफी, 5 एक्सरे मशीन का मांग की गई थी।
4. करोड़ों की मशीनें डंप अस्पताल में कैंसर जांच और उपचार की सुविधाएं हैं। मगर, पैट स्कैन और गामा-रे मशीन धूल खा रही हैं।
क्या थी व्यवस्था- पुरानी पद्धति से ही जांच।
क्या होना चाहिए- विभाग चाहे तो आज से ही मशीनों से जांच शुरू हो सकती है। ये उपयोगी मशीन है, क्योंकि इससे किसी भी प्रकार के कैंसर का पता बहुत कम समय में चल सकता है।
5. गलियारे में सोते परिजन 1000 मरीज भर्ती रहते हैं। ये दूर-दराज से आते हैं। साथ में आए परिजनों को गलियारे में सोना पड़ता है।
CG News : क्या थी व्यवस्था- अस्पताल में मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिए व्यवस्था नहीं थी।
क्या होना चाहिए- परिजनों के ठहरने अलग से व्यवस्था हो। अभी मंगल भवन में सीमित व्यवस्था है। अंबेडकर में भी अलग से व्यवस्था होनी चाहिए।



