SIR Supreme Court: SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा-SIR कराना चुनाव आयोग का अधिकार, प्रक्रिया में कोई खामी नहीं

SIR Supreme Court: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि SIR कराना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बुधवार को यह अहम फैसला सुनाया। इससे पहले कोर्ट ने इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मतदाता सूची को सही और पारदर्शी बनाए रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और इसके लिए विशेष पुनरीक्षण जैसी प्रक्रिया जरूरी हो सकती है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
दरअसल, कई याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे SIR अभियान की वैधता पर सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत इस तरह का विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का अधिकार नहीं है। सबसे ज्यादा विवाद चुनाव आयोग की उस शर्त को लेकर हुआ, जिसमें कहा गया था कि जिन लोगों का नाम 2002 या कुछ राज्यों में 2003 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं था, उन्हें ऐसे व्यक्ति से पारिवारिक संबंध साबित करना होगा, जिसका नाम उस पुरानी सूची में मौजूद हो।
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याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे कई लोगों के वोटर बनने के अधिकार पर असर पड़ सकता है। वहीं चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि मतदाता सूची को फर्जी नामों और गलत एंट्री से मुक्त रखने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची की पारदर्शिता के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।
बिहार चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने बुधवार को साफ कहा कि चुनाव आयोग को SIR जैसी विशेष प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार है और यह संविधान व कानून के दायरे में है। अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए किसी प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह सामान्य वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया से अलग है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक SIR का मकसद निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद चुनाव सुनिश्चित करना है, इसलिए इसे रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे मतदाता सूची को शुद्ध और सही बनाए रखने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने माना कि जनप्रतिनिधित्व कानून चुनाव आयोग को जरूरत पड़ने पर किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन्हीं के तहत की गई कार्रवाई है। अदालत के मुताबिक चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई काम नहीं किया।
इसमें कुछ भी मनमाना नहीं
कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया में लोगों को अपनी बात रखने और दस्तावेज जमा करने के पर्याप्त मौके दिए गए। नोटिस, सुनवाई और अन्य सुरक्षा उपायों का पालन किया गया है, इसलिए इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता। अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेजों को भी तर्कसंगत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने के लिए दस्तावेजों का वर्गीकरण जरूरी और उचित है।
वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक बेहद अहम टिप्पणी भी की। अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसकी भारतीय नागरिकता खत्म हो गई। कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग केवल यह तय कर सकता है कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो या हटाया जाए। नागरिकता पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। अगर नागरिकता को लेकर कोई विवाद होता है, तो उसका फैसला संबंधित सक्षम प्राधिकरण करेगा।
विपक्ष ने उठाए थे सवाल
SIR Supreme Courtदरअसल, बिहार में SIR प्रक्रिया शुरू होने के बाद कई याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं और कुछ विपक्षी दलों का कहना था कि यह प्रक्रिया सामान्य नियमों से अलग है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। कुछ लोगों ने इसे पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच तक बताया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी, संवैधानिक और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र के भीतर है।



