Peddi Review: राम चरण और जान्हवी कपूर की फिल्म 'पेड्डी' थिएटर में हुआ रिलीज! इमोशन और एक्शन का दिखा शानदार संगम – RGH NEWS
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Peddi Review: राम चरण और जान्हवी कपूर की फिल्म ‘पेड्डी’ थिएटर में हुआ रिलीज! इमोशन और एक्शन का दिखा शानदार संगम

Peddi Review बॉलीवुड हो या फिर साउथ फिल्म इंडस्ट्री, जब भी कोई बड़ी पैन-इंडिया फिल्म रिलीज होती है तो उसके साथ भारी-भरकम उम्मीदें जुड़ जाती हैं। इस बार ये उम्मीदें ‘पेड्डी’ के साथ जुड़ी हैं। बार-बार टलने, सोशल मीडिया पर लीक होते प्लॉट और फैंस की लगातार बढ़ती बेसब्री के बीच राम चरण की ‘पेड्डी’ आखिरकार सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। फिल्म को लेकर जितना उत्साह देखने को मिला, उतनी ही बेकरारी ये फैंस को ये जानने में भी है कि आखिर ये फिल्म कैसी होगी। आज के दौर में हर सितारे को चमकना है और एक लार्जर देन लाइफ वाला इंपैक्ट भी जगाना है। इसी बीच रिलीज हुई बुची बाबू साना के निर्देशन में बनी राम चरण की ‘पेड्डी’ ने बिल्कुल अलग राह चुनी। फिल्म में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिलेगा। ये फिल्म दर्शकों को खुश होने, सेलिब्रेट करने के मौके तो देगी है, इसके साथ ही कुछ सिनेमाई मंथन के मुद्दे भी पैदा करती है। इस सबके बीच ये एक ऐसी फिल्म बनकर उभरती है जो दिमाग से ज्यादा सीधे दिल पर चोट करती है।

 

क्या है कहानी?

फिल्म की कहानी किसी चकाचौंध से भरे बड़े शहर की नहीं, बल्कि पहाड़ों के बीच बसे एक ऐसे गुमनाम गांव की है, जिसका सरकारी कागजों और देश के नक्शे पर कोई वजूद नहीं है। इस बेनाम गांव में रहने वाले पंद्रह सौ लोगों के पास न तो बेसिक सुविधाएं हैं और न ही वोट देने का अधिकार। गांव के लोगों की एक चाहत है कि उनके गांव में एक रेलवे स्टेशन हो। वो लोग रेलवे स्टेशन को सिर्फ एक यातायात के जरिए के तौर पर नहीं देख रहे, बल्कि समाज के वजूद और उनकी नागरिकता के सबसे बड़े सबूत के तौर पर देख रहे हैं। इसी लचर व्यवस्था के बीच पेड्डी (राम चरण) रहता है, जिसे आस-पास के इलाकों में आटा कुली यानी पैसों के लिए खेलने वाला मजदूर खिलाड़ी कहा जाता है। विजयनगरम और बोब्बिली के बीच जब भी क्रिकेट या किसी भी लोकल खेल के मुकाबले होते हैं तो पेड्डी को अपनी टीम में शामिल करने के लिए बोलियां लगती हैं। पेड्डी के लिए खेल सिर्फ पेट पालने और चंद पैसे कमाने का जरिया है, लेकिन कहानी तब एक बेहद इमोशनल मोड़ लेती है जब पेड्डी का ये खेल पर्सनल इंट्रेस्ट से ऊपर उठकर बेनाम गांव को एक पहचान दिलाने का इकलौता जरिया बन जाता है। एक बेपरवाह दिहाड़ी मजदूर से लेकर अपने लोगों के स्वाभिमान की खातिर सब कुछ दांव पर लगा देने वाले नायक तक का पेड्डी का सफर ही इस फिल्म की जान है।

 

कैसा है सितारों का अभिनय

पूरी फिल्म राम चरण के मजबूत कंधों पर टिकी है और उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। उनका एंट्री सीन लोगों में जोश भरने वाला है और फैंस इसे देख सिनेमाघरों में उछल पड़ेंगे। स्टारडम भरी अपील पहले सीन से ही जाग जाती है, ज्यादातर लोग इसे अपने कैमरों में कैद करना पसंद करेंगे। राम चरण के फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन से लेकर किरदार में झलक रही उनकी बेबसी काबिले तारीफ है। किरदार के सीधेपन और उसके भीतर छिपे गुस्से को अपने हाव-भाव में पूरी तरह उतार लिया है। चाहे वो धोखेबाजी से भरा क्रिकेट का मैदान हो या पुलिस गोदाम में अपनी पहचान साबित करने के लिए गिड़गिड़ाने का बेहद इमोशनल सीन, राम चरण दर्शकों को अपने साथ रोने पर मजबूर कर देते हैं। उनके एक-एक आंसू और पसीने की बंद को आप फील कर पाएंगे। फिल्म जैसे-जैसे क्लाइमैक्ल की ओर बढ़ती है उनका किरदार एक ऐसा मोड़ लेता है, जिसे करने की हिम्मत मेन स्ट्रीम का कोई भी कमर्शियल हीरो आसानी से नहीं करेगा। इसके अलावा उनका डांस हमेशा की तरह लाजवाब है, ये हमेशा से उनकी यूएसपी रही है।

 

इस फिल्म की कहानी में उन्हें साथी कलाकारों का भी बेहतरीन साथ मिला है। कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज स्टार शिव राजकुमार ने ‘गोरनायडू’ के किरदार में कमाल के लगे हैं और उनका स्क्रीन प्रेजेंस एक अलग अपील पैदा करेगा। पेड्डी और उनके बीच के गुरु-शिष्य वाले दृश्य फिल्म के सबसे मजबूत इमोशनल पिलर हैं, जो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म कराटे किड की याद दिला सकते हैं। विलेन के रूप में जगपति बाबू का ‘अप्पला सूरी’ का किरदार कुछ जगहों पर थोड़ा लाउड और मेलोड्रैमेटिक लगता है, लेकिन वो फिर भी कुछ हिस्सों में काफी सहज और निखर कर सामने आए हैं। बोमन ईरानी ने भी ओलंपिक कमेटी के अधिकारी के रूप में एक छोटा लेकिन इंपैक्टफुल रोल किया है। उनका कैमियो कहानी को एक अलग नजरिया दे रहा है।

 

तमाम खूबियों के बाद भी ‘पेड्डी’ एक मुकम्मल फिल्म बनने से थोड़ा दूर रह जाती है। फिल्म की सबसे बड़ी और सबसे खटकने वाली कमजोरी है जाह्नवी कपूर द्वारा निभाया गया ‘अचियम्मा’ का किरदार। समस्या सिर्फ यह नहीं है कि उनकी प्रेम कहानी मुख्य प्लॉट से भटकी हुई लगती है, बल्कि दिक्कत उनके किरदार के चित्रण में है। फिल्म एक तरफ तो आत्मसम्मान और सामाजिक गरिमा की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन दूसरी तरफ जाह्नवी के पूरे ट्रैक को केवल ग्लैमर के चश्मे से दिखाती है। साउथ की ज्यादातर कॉमर्शियल फिल्मों में हीरोइनों का यही हाल देखने को मिलता है। फिलहाल इससे बॉक्स ऑफिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और ऐसे में मेकर्स इसे बदलने के विचार को मन में लाते भी नहीं हैं।

 

जाह्नवी के हिस्से में आए डायलॉग और रोमांटिक सीन कई जगहों पर बेहद पुराने जमाने के हैं। बेहतर होता कि फिल्म में लव एंगल रखा न जाता या रखा जाता तो पेड्डी के जीवन में उसके सकारात्मक योगदान दिखाए जाते। इसके अलावा दिव्येंदु शर्मा (रामबुज्जी) के साथ पेड्डी की दुश्मनी का ट्रैक भी किसी मजबूत कहानी के बजाय सिर्फ एक एक्शन सीक्वेंस सेट करने का बहाना ज्यादा नजर आता है। दिव्येंदु एक मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन इस किरदार में कुछ ज्यादा नहीं कर पाए हैं। उनके किरदार को बेहतर तरह से बिल्ड किया जा सकता था, लेकिन हीरो की छवि को बड़ा करने के चक्कर में एक बार फिर साउथ सिनेमा भयंकर विलेन देने से चूक गया।

 

निर्देशन और लेखन की गहराई

निर्देशक बुची बाबू साना अभी फिल्मों में नए हैं, उनका एक्सपीरियंस सिर्फ दो फिल्में पुराना है, लेकिन इस फिल्म से उन्होंने साबित कर दिया है कि वे अपने गुरु सुकुमार से काफी कुछ सीख कर आए हैं। जिस तरह सुकुमार ने ‘रंगस्थलम’ या ‘पुष्पा’ में नायक के किरदार को गढ़ा था ठीक उसी तरह इस फिल्म में भी बुची ने राम चरण के किरदार को कमर्शियल सिनेमा के ढांचे में पिरोया है। वे एक ऐसा मु्द्दा उठा रहे हैं, जिससे भले ही हर कोई रिलेट न कर पाए, लेकिन वो ये जरूर सोचेगा कि आखिर किसी शख्स को कितनी तकलीफ होती होगी, जब उसकी पहचान ही न हो, वो किसी को बता ही न पाए कि वो कहां से आता है, कहां का रहने वाला है या उसका पता क्या है? इतना ही नहीं इसके चलते उसकी बुनियादी जरूरते भी पूरी न हो पाएं तो समस्या गंभीर मर्ज में बदल जाती है।

 

बुची बाबू का लेखन पारंपरिक कमर्शियल सिनेमा के फॉर्मूले एंट्री, गाने, रोमांस, इंटरवल का बड़ा धमाका और क्लाइमेक्स पर ही चलता है। ट्रेलर और सोशल मीडिया लीक्स की वजह से कहानी के कई मोड़ पहले से ही प्रेडिक्टेबल यानी अनुमान लगाने योग्य हो जाते हैं, लेकिन बुची बाबू की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे जानते हैं कि भले ही दर्शकों को मंजिल का पता हो, अगर सफर के जज्बात सच्चे हों तो दर्शक अंत तक कुर्सी से बंधा रहता है। वे दृश्यों को धीरे-धीरे बिल्ड करते हैं और दर्शकों के दिल में किरदारों के प्रति सहानुभूति और गहरे इमोशन्स पैदा करते हैं। फिल्म 3 घंटे से ज्यादा लंबी है, लेकिन कहीं भी बोर नहीं करती, कहानी के फ्लो के साथ आप आगे बढ़ेंगे। कुश्ती, क्रिकेट और स्प्रिंटिंग ये खेल प्रेमियों को जरूर रास आएंगे।

 

तकनीकी पक्ष

तकनीकी तौर पर ‘पेड्डी’ एक बेहद सलीके से बुनी गई फिल्म है, जिसमें बैकग्राउंड स्कोर, म्यूजिर, सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग का खास ख्याल रखा गया है। ऑडियो और विजुअल्स दोनों पर पोस्ट प्रोडक्शन में हुई मेहनत साफ नजर आएगी। ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान का संगीत इस पूरी कहानी की धड़कन है। फिल्म के गाने भले ही चार्टबस्टर बनने में थोड़ा वक्त लें, लेकिन रहमान का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के हर एक फ्रेम की ताकत को दोगुना कर रहे हैं। जीत की खुशी हो, दिल टूटने का दर्द हो या फिर किसी का बलिदान, रहमान के सही और सटीक धुनों को तैयार किया है, जो एक इमोशनल ग्राफ को सीधे ऊपर ले जाने में कामयाब हैं।

 

आर रथनावेलु की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को एक बिल्कुल अलग और रियल टेक्सचर देती है। गांव की मिट्टी, पारंपरिक कुश्ती के अखाड़े, गुड़ की मिलें और गांव की धूल भरी संकरी सड़कें पर्दे पर बिल्कुल असल लगती हैं। रात के समय फिल्माए गए दृश्यों में अंधेरे और लाइट का इस्तेमाल कमाल का है। हालांकि विजुअल्स अच्छे हैं, लेकिन वीएफएक्स कई जगहों पर काफी कमजोर और नकली लगते हैं। बस ये वीएफएक्स ही रथनावेलु की शानदार सिनेमैटोग्राफी के मजे को किरकिरा कर रहे हैं। इतने बड़े बजट की फिल्म में पोस्ट-प्रोडक्शन खास तौर पर वीएफएक्स का काम और बेहतर होना चाहिए था।

 

वर्डिक्ट

Peddi Review छोटी मोटी खामियों के बावजूद ‘पेड्डी’ को खारिज करना नामुमकिन है, क्योंकि इसकी नीयत साफ है और इसका सामाजिक सरोकार बेहद सच्चा है। यह एक ऐसी फिल्म है जो बार-बार आपसे कहती है कि अपने दिमाग को थोड़ा आराम दें और दिल की सुनें और जब आप ऐसा करते हैं तो फिल्म आपको निराश नहीं करती। व्यावसायिक सिनेमा में कई बार गंभीर मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, लेकिन इस फिल्म ने इसे भी पकड़ कर रखा है। ‘पेड्डी’ कोई परफेक्ट फिल्म नहीं है। इसमें लॉजिक की कमियां हैं, लेकिन इन सबके बावजूद यह एक बेहद ईमानदार और बड़े दिल वाली फिल्म है। राम चरण के करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस है। अगर आप राम चरण के फैन हैं और एक ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ आपको थोड़ा भावुक भी करे तो ‘पेड्डी’ आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव साबित होगी।

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