नवरात्री में कलश स्थापना का मुहर्त जाने और पूजन करने का सही तरीका नही तो माता रानी हो जाएँगी नारज,जाने सही तरीका  – RGH NEWS
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नवरात्री में कलश स्थापना का मुहर्त जाने और पूजन करने का सही तरीका नही तो माता रानी हो जाएँगी नारज,जाने सही तरीका 

नवरात्री में कलश स्थापना का मुहर्त जाने और पूजन करने का सही तरीका नही तो माता रानी हो जाएँगी नारज

नवरात्री में कलश स्थापना का मुहर्त जाने और पूजन करने का सही तरीका नही तो माता रानी हो जाएँगी नारज,जाने सही तरीका नवरात्री की सारि तैयारियां चालू हो गई है बस माता रानी के विराजमान होने की देरी है आगे जानने के लिए अंत तक बने रहे

नवरात्री में कलश स्थापना का मुहर्त जाने और पूजन करने का सही तरीका नही तो माता रानी हो जाएँगी नारज,जाने सही तरीका

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सेहत को ठीक करने के लिए सबसे अच्छा समय(The best time to improve your health)

शारदीय नवरात्र से सर्दियों की शुरुआत होती है, इसलिए इस दौरान हल्का आहार लिया जाता है। इस समय के दौरान पाचन प्रक्रिया आम दिनों की अपेक्षा धीमी होती है। जिससे आलस्य, सुस्ती महसूस होती है। इसी कारण कहते हैं कि नवरात्र में उपवास नहीं करें तो भी भोजन हल्का करना चाहिए।

उपवास से हमारा पाचन तंत्र ठीक हो जाता है। खाना पचाने की क्षमता बेहतर होती है। मौसम परिवर्तन का ये मुख्य समय होता है। इस कारण बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया और जीवाणु ज्याद एक्टिव रहते हैं। ऐसे में नवरात्रि के दिनों में उपवास का महत्व बढ़ जाता है।

नवरात्रि: दिन-रात बराबर होते हैं, नई शुरुआत और पुराना खत्म होने का समय

नवरात्रि के वक्त सूर्य भूमध्यरेखीय तल के सबसे करीब होता है और दिन-रात बराबर होते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे इक्विनॉक्स कहते हैं। ये साल में दो बार होता है। पहला मार्च में उसके बाद 22 सितंबर को, जिसे ओटमनल इक्विनॉक्स कहते हैं। इन दिनों में धरती तक सूर्य और चंद्रमा की रोशनी बराबर पहुंचती है। साल में जब ये खगोलीय घटना हो रही होती है, उसी समय हम शारदेय नवरात्रि मनाते हैं। शरद की नवरात्रि बर्फ के गिरने का मौसम लाती है।

आश्विन महीने की शारदेय नवरात्रि में न ज्यादा ठंड रहती है न गर्मी। इस वक्त प्रकृति बेहद अनुकूल होती है। प्रकृति और मौसम के बदलने का असर निजी और बाहरी दोनों तरह से दिखता है। निजी रूप से ये साधना, ध्यान का समय है, जबकि बाहर दुनिया में इसी दौरान गर्मी कम होती है। विज्ञान में इसे प्रिंसिपल ऑफ थर्मोडायनामिक्स कहते हैं।

हमारे ऋषि जानते थे कि इक्विटल साइकल के बिंदु, यानी ऋतुओं का संधिकाल ब्रह्मांड की शक्ति के विघटन और उसे फिर से बनाने का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये हमारे मन और शरीर की छोटी-सी दुनिया में भी ग्रीन साइकल के पूरा होने और फिर नए अंकुर फूटने का ही बड़ा रूप है।

वृंदावन: काली रूप में होती है कृष्ण की पूजा

श्रीकृष्ण जन्म स्थान वृंदावन में कृष्ण कालीपीठ है। यहां कृष्ण के काली रूप को पूजा जाता है। भागवत पुराण की कथा में कृष्ण को काली का अवतार बताया है। करीब पांच फीट की चारभुजा वाली ये मूर्ति काले चिकने पत्थर से बनी है।

देवी के विग्रह का मुख और चरण कृष्ण जैसे हैं, जबकि बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में खड्ग और निचले वाले हाथ में मुंड है। दाहिना हाथ आशीर्वाद मुद्रा में है। मंदिर में वैष्णव पद्धति से देवी पूजा होती है।

भागवत पुराण की कथा के मुताबिक शिव जी ने पार्वती से स्त्री रूप में अवतार लेने की इच्छा जताई, तब पार्वती ने कहा था कि मेरा भद्रकाली रूप कृष्ण के रूप में अवतार लेगा। तब आप राधा रूप में अवतार लेंगे। इसके बाद वृंदावन में दोनों ने जन्म लिया।

तमिलनाडु: यहां द्रौपदी को पूजते हैं काली रूप में

तमिल महाभारत में जिक्र है कि द्रौपदी ही काली का रूप थीं। द्रौपदी ने प्रण लिया था कि अपना सिर उस इंसान के रक्त से धोएंगी, जिसने उन्हें अपमानित किया था, इसीलिए दक्षिण भारत में द्रौपदी को महाकाली का अवतार माना जाता है। यहां देवी द्रौपदी अम्मन कहा जाता है। जो श्रीकृष्ण की मदद के लिए जन्मी थीं।

कर्नाटक के बेंगलुरु में द्रौपदी देवी का श्री धर्मरायस्वामी मंदिर है। ये मंदिर 800 साल पुराना है। मान्यता है कि सेना के लोगों ने द्रौपदी का मंदिर बनाया था। धर्मराय स्वामी यानी पांडवों में सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर हैं। मंदिर में पांचों भाइयों की प्रतिमाएं हैं। नवरात्रि में यहां विशेष पूजा होती है।

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